अंधविश्वास की नगरी

अंधविश्वास दुनिया के कोने-कोने में फैले हुए हैं। कभी-कभी तो उन्हें संस्कृति की धरोहर का एक हिस्सा मानकर अनमोल समझा जाता है, तो कभी-कभी इनमें विज्ञान ढूंढा जाता है। पश्चिम में जहां अंधविश्वास को गंभीरता से नहीं लिया जाता, वहीं पूर्व में इसके प्रति विश्वास है, तो अफ्रीका में इसके प्रति जुनून है। अंधविश्वास की असली जड़ भूत-प्रेत का डर, जादू-टोने होने का डर, प्रेम-विवाह, व्यापार-नौकरी में असफलता का डर और दुर्भाग्य घटित होने का डर है।अफ्रीका जैसे देशों के लोगों की जिंदगी में धर्म, विज्ञान से ज्यादा अंधविश्वास की पकड़ ज्यादा मजबूत है। अफ्रीकी संस्कृति का अधिकतर हिस्सा अंधविश्वास की बुनियाद पर बना है। हालांकि पश्चिम में पुराने अंधविश्वासों की जगह नए अंधविश्वासों ने ले ली है।कभी-कभी अंधविश्वास बहुत काम के होते हैं तो कभी-कभी ये नुकसानदायी। जैसे जादू एक झूठ है लेकिन वह सत्य की तरह आभासित होता है। जब तक यह मनोरंजन का साधन है, तब तक ठीक है लेकिन जब इसके दम पर लोगों को धर्मांतरित किया जाए या उनको ठगा जाता है तो यह सामाजिक बुराई बन जाता है। चमत्कार या किसी आस्था के बल पर किसी व्यक्ति का जीवन बदल जाए, उसका रोग ठीक हो जाए, उसके संकट दूर हो जाए या अचानक वह धनवान बन जाए, तो उसे ठीक माना जा सकता है, लेकिन किसी के रोग ठीक करके बदले में उसे ठगा जाए या धर्मांतरित किया जाए तो यह अपराध है। खैर... आओ हम जानते हैं ऐसे अंधविश्वास जिनके बारे में कुछ भी कहना मुमकिन 
गंडा-ताबीज : किसी की बुरी नजर से बचने, भूत-प्रेत या मन के भय को दूर करने या किसी भी तरह के संकट से बचने के लिए गंडे-ताबीज का उपयोग किया जाता है। गंडा-ताबीज करना प्रत्येक देश और धर्म में मिलेगा। चर्च, दरगाह, मस्जिद, मंदिर, सिनेगॉग, बौद्ध विहार आदि सभी के पुरोहित लोगों को कुछ न कुछ गंडा-ताबीज देकर उनके दुख दूर करने का प्रयास करते रहते हैं। हालांकि कई तथाकथित बाबा, संत और फकीर ऐसे हैं, जो इसके नाम पर लोगों को ठगते भी हैं। 
विश्वास का खेल : यदि आपके मन में विश्वास है कि यह गंडा-ताबीज मेरा भला करेगा तो निश्चित ही आपको डर से मुक्ति मिल जाएगी। मान्यता है कि नाड़ा बांधने या गले में ताबीज पहनने से सभी तरह की बाधाओं से बचा जा सकता है, लेकिन इन गंडे-ताबीजों की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है अन्यथा ये आपको नुकसान पहुंचाने वाले सिद्ध होते हैं। जो लोग इन्हें पहनकर शराब आदि का नशा करते हैं या किसी अपवित्र स्थान पर जाते हैं उनका जीवन कष्टमय हो जाता है।
 
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भभूति : धूने की राख से बनने वाली भभूति को 'ऊदी' भी कहते हैं। भारत में इसका ज्यादा प्रचलन है। मान्यता है कि किसी सिद्ध बाबा या स्थान से प्राप्त की गई भभूति को लगाने से संकट दूर रहते हैं और व्यक्ति को हर कार्य में सफलता मिलती है। ऊदी में शिर्डी के साईं बाबा के स्थान की ऊदी को सबसे चमत्कारिक माना जाता है।
 
इसे 'विभूति' भी कहते हैं। इसे व्यक्ति अपने मस्तक पर लगाता है और थोड़ी सी जीभ पर रखता है। मान्यता के अनुसार भभूति हर रोग, शोक, संकट और बाधा को दूर करने वाली होती है। यह जीवन में शांति और सुख देने वाली होती है।
 
विभूति का सच : प्राचीनकाल में यज्ञ में हर तरह की औषधियां डाली जाती थीं जिसके चलते यज्ञ की विभूति को पवित्र और रोगों को दूर करने वाली माना जाता था। लोग इसे अपने मस्तक पर लगाते थे और कुछ मात्रा में इसे ग्रहण भी करते थे। लेकिन आजकल तो कंडे या बबूल की राख से ही भभूति तैयार कर ली जाती है।
 
कैसे शुरू हुआ भभूति का प्रचलन : मध्यकाल में शैवपंथ के सिद्ध योगी, बाबा, अवधूत आदि संतजन लोगों को भभूति देकर उनकी हर इच्छा की पूर्ति करते थे। मध्यकाल में गुरु मत्स्येंद्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ लोगों को विभूति देकर उनके संकट दूर करते थे। बाद में शिर्डी के सांईं बाबा की भभूति के चमत्कारों के किस्से सुनने को मिलते हैं।
 
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नींबू और मिर्च : दुकानों के दरवाजों पर नींबू और हरी मिर्च को एक धागे में बांधकर लटकाया जाता है। इसे नजरबट्‍टू कहते हैं। माना जाता है कि इससे किसी भी प्रकार की नजर-बाधा और जादू-टोने से बचा जा सकता है। हालांकि आयुर्वेद में नींबू को एक चमत्कारिक दवाई माना जाता है।
 
मान्यता अनुसार बुरी नजर लगने के बाद व्यक्ति का चलता व्यवसाय बंद हो जाता है, घर में बरकत समाप्त हो जाती है। इसके चलते जहां पैसों की तंगी आ जाती है, वहीं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।
 
इससे बचने के लिए दुकानों और घरों के बाहर नींबू-मिर्च टांग दी जाती है। ऐसा करने से जब बुरी नजर वाला व्यक्ति इसे देखता है तो नींबू का खट्टा और मिर्च का तीखा स्वाद बुरी नजर वाले व्यक्ति की एकाग्रता को भंग कर देता है। यह बुरी नजर से बचने का उपाय है।
 
नींबू का वास्तु : माना जाता है कि नींबू का पेड़ होता है, वहां किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय नहीं हो पाती है। नींबू के वृक्ष के आसपास का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहता है। इसके साथ वास्तु के अनुसार नींबू का पेड़ घर के कई वास्तुदोष भी दूर करता है।
 
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पवित्र जल : जल को हिन्दू धर्म में पवित्र करने वाला माना गया है। जल की पवित्रता के बारे में वेद और पुराणों में विस्तार से उल्लेख मिलता है। यह माना जाता है कि गंगा में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और मन निर्मल हो जाता है। गंगा नदी के जल को सबसे पवित्र जल माना जाता है। इसके जल को प्रत्येक हिन्दू अपने घर में रखता है। गंगा नदी दुनिया की एकमात्र नदी है जिसका जल कभी सड़ता नहीं है।
 
पवित्र जल छिड़ककर कर लोगों को पवित्र किए जाने की परंपरा भी है। आचमन करते वक्त भी पवित्र जल का महत्व माना गया है। मूलत: इससे कुंठित मन को निर्मल बनाने में सहायता मिलती है। मन के निर्मल होने को ही पापों का धुलना माना गया है।
 
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झाड़-फूंक : झाड़-फूंक कर लोगों का भूत भगाने या कोई बीमारी का इलाज करने, नजर उतारने या सांप के काटे का जहर उतारने का कार्य ओझा लोग करते थे। यह कार्य हर धर्म में किसी न किसी रूप में आज भी पाया जाता है।
 
पारंपरिक समाजों में ऐसे व्यक्ति को 'ओझा' कहा जाता है। कुछ ऐसे दिमागी विकार होते हैं, जो डॉक्टरों से दूर नहीं होते हैं। ऐसे में लोग पहले ओझाओं का सहारा लेते थे। ओझा की क्रिया द्वारा दिमाग पर गहरा असर होता था और व्यक्ति के मन में यह विश्वास हो जाता था कि अब तो मेरा रोग और शोक ‍दूर हो जाएगा। यह विश्वास ही व्यक्ति को ठीक कर देता था।
 
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चंगाई सभा : आजकल दुनियाभर में ईसाई धर्म के प्रचार और प्रसार के तरीके बदल गए हैं। भारत में जहां चंगाई सभा करके लोगों को गंभीर से गंभीर रोग ठीक करने का दावा किया जाता है, वहीं पश्चिम में उत्तेजनापूर्ण भाषणों से लोगों को ईसाई धर्म से जोड़े रखने का उपक्रम किया जाता है। हालांकि इस तरह के ठगने के कार्य हिन्दू धर्म में भी किए जाते हैं। संत आसाराम, संत निर्मल बाबा जैसे लोग इसका उदाहरण है।

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