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Showing posts from March, 2021

करोना एक महामारी

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कोरोनावायरस  (Coronavirus) कई प्रकार के  विषाणुओं  (वायरस) का एक समूह है इस प्रकोप को एक दर्जन से अधिक राज्यों और  केंद्र शासित प्रदेशों  में महामारी घोषित किया गया है, जहां महामारी रोग अधिनियम, 1897 के प्रावधानों को लागू किया गया है, और शैक्षणिक संस्थानों और कई वाणिज्यिक संस्थानों को बंद कर दिया गया है। साथ  भारत  ने सभी पर्यटक वीजा को भी निलंबित कर दिया है, क्योंकि अधिकांश पुष्ट मामले अन्य देशों से लौटे लोगों में पाये गए है। सरकार ने देश भर के 75 जिलों में लॉकडाउन जारी किया था, जहां 31 मार्च तक  कोविड-19  मामलों की पुष्टि की गई थी। जो  स्तनधारियों  और  पक्षियों  में रोग उत्पन्न करता है। यह  आरएनए वायरस  होते हैं। इनके कारण मानवों में  श्वास तंत्र संक्रमण  पैदा हो सकता है जिसकी गहनता हल्की (जैसे सर्दी-जुकाम) से लेकर अति गम्भीर (जैसे,  मृत्यु ) तक हो सकती है।  गाय  और  सूअर  में इनके कारण  अतिसार  हो सकता है जबकि इनक...

संतगाडगे जी का जीवन

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गाडगे महाराज (Gadge Maharaj), जिन्हें लोकप्रिय रूप से संत गाडगे महाराज या गाडगे बाबा कहा जाता था. एक संत और समाज सुधारक थे. व्यापक रूप से महाराष्ट्र के सबसे बड़े समाज सुधारकों में से एक के रूप में माना जाता है, उन्होंने कई सुधार किए हैं. गाँवों का विकास और उनकी दृष्टि अभी भी देश भर के कई दान संगठनों, शासकों और राजनेताओं को प्रेरित करती है. उनके नाम पर कॉलेज और स्कूल सहित कई संस्थान शुरू किए गए हैं. उनके बाद भारत सरकार द्वारा स्वच्छता और पानी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा की गई. उनके सम्मान में अमरावती विश्वविद्यालय का नाम भी रखा गया है. उनके सम्मान में महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘संत गाडगेबाबा ग्राम स्वछता अभियान’ शुरू किया गया था. बिंदु (Points) जानकारी (Information) नाम (Name) संत गाडगे महाराज और गाडगे बाबा वास्तविक नाम (Real Name) देविदास डेबुजी जानोरकर पिता का नाम (Father Name) झिंगरजी जानोरकर माता का नाम (Mother Name) सखुबाई जन्म दिनांक (Birth Date) 23 फरवरी 1876 जन्म स्थान (Birth Place) शेंडगाव, महाराष्ट्र पेशा (Profession) आध्यात्मिक गुरु मृत्यु दिनांक (Death) 20 द...

अंधविश्वास की नगरी

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अंधविश्वास दुनिया के कोने-कोने में फैले हुए हैं। कभी-कभी तो उन्हें संस्कृति की धरोहर का एक हिस्सा मानकर अनमोल समझा जाता है, तो कभी-कभी इनमें विज्ञान ढूंढा जाता है। पश्चिम में जहां अंधविश्वास को गंभीरता से नहीं लिया जाता, वहीं पूर्व में इसके प्रति विश्वास है, तो अफ्रीका में इसके प्रति जुनून है। अंधविश्वास की असली जड़ भूत-प्रेत का डर, जादू-टोने होने का डर, प्रेम-विवाह, व्यापार-नौकरी में असफलता का डर और दुर्भाग्य घटित होने का डर है। अफ्रीका जैसे देशों के लोगों की जिंदगी में धर्म, विज्ञान से ज्यादा अंधविश्वास की पकड़ ज्यादा मजबूत है। अफ्रीकी संस्कृति का अधिकतर हिस्सा अंधविश्वास की बुनियाद पर बना है। हालांकि पश्चिम में पुराने अंधविश्वासों की जगह नए अंधविश्वासों ने ले ली है।कभी-कभी अंधविश्वास बहुत काम के होते हैं तो कभी-कभी ये नुकसानदायी। जैसे जादू एक झूठ है लेकिन वह सत्य की तरह आभासित होता है। जब तक यह मनोरंजन का साधन है, तब तक ठीक है लेकिन जब इसके दम पर लोगों को धर्मांतरित किया जाए या उनको ठगा जाता है तो यह सामाजिक बुराई बन जाता है। चमत्कार या किसी आस्था के बल पर किसी व्यक्ति का जीवन बदल ज...

साईं बाबा की सच्चाई

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जन्म-तिथि एवं स्थान साईं बाबा का जन्म कब और कहाँ हुआ था एवं उनके माता-पिता कौन थे ये बातें अज्ञात हैं। किसी दस्तावेज से इसका प्रामाणिक पता नहीं चलता है। स्वयं शिरडी साईं ने इसके बारे में कुछ नहीं बताया है। [5]  हालाँकि एक कथा के रूप में यह प्रचलित है कि एक बार श्री साईं बाबा ने अपने एक अंतरंग भक्त म्हालसापति को, जो कि बाबा के साथ ही मस्जिद तथा चावड़ी में शयन करते थे, बतलाया था कि "मेरा जन्म पाथर्डी ( पाथरी ) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता ने मुझे बाल्यावस्था में ही एक फकीर को सौंप दिया था।" जब यह चर्चा चल रही थी तभी पाथरी से कुछ लोग वहाँ आये तथा बाबा ने उनसे कुछ लोगों के सम्बन्ध में पूछताछ भी की। [6]  उनके जन्म स्थान एवं तिथि की बात वास्तव में उनके अनुयायियों के विश्वास एवं श्रद्धा पर आधारित हैं। शिरडी साईं बाबा के अवतार माने जाने वाले  श्री सत्य साईं बाबा  ने अपने पूर्व रूप का परिचय देते हुए शिरडी साईं बाबा के प्रारंभिक जीवन सम्बन्धी घटनाओं पर प्रकाश डाला है जिससे ज्ञात होता है कि उनका जन्म २८ सितंबर १८३५ में तत्कालीन  हैदराबाद  राज्य के ...

भूतों का बसेरा

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भानगढ़ का किला   भानगढ़ का किला भारत की सबसे डरावनी जगह मानी जाती है। लोगों का मानना है कि रात के वक्त यहां भूत प्रेत आते हैं और बाकयदा अपनी सभा जमाते हैं। लोगों के मुताबिक 16वीं शताब्दी में इसी शहर में रहने वाले सिंघिया नाम के एक जादूगर को भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती के साथ प्यार हो गया। किसी कारणवश जादूगर की मौत हो गई, जादूगर ने मरते वक्त भानगढ़ के किले को श्राप दिया कि यह जल्दी ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा और इसके आस पास कोई नहीं रह पाएगा। उसके बाद कुछ ही दिनों में भानगढ़ में कई आपदाएं आईं और पूरा किला खण्डहरों में तब्दील हो गया। लोगों का मानना है कि रात के वक्त हजारों लोग जो मरे हैं भूत के रूप में किले के अंदर भ्रमण करते हैं।कई लोगों की किले के अंदर रात को जाने में मौत भी हो चुकी है। लोग कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति जो रात के वक्त यहां जाता है वापस नहीं आता। इसको लेकर भारतीय पुरातत्व विभाग ने बोर्ड भी लगा रखा है कि शाम होने के बाद व सुबह होने से पहले इस किले में प्रवेश वर्जित है।

पिथौरागढ़ का कामाख्या मंदिर

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अगर आप कभी पिथौरागढ़ गये होंगे तो कामख्या देवी के मंदिर से जरूर वाकिफ़ होंगे. पिथौरागढ़ झूलाघाट मार्ग पर स्थित सैनिक छावनी के ठीक ऊपर पहाड़ी पर एक भव्य मां कामाख्या मंदिर है. सैन्य छावनी क्षेत्र के ठीक ऊपर बना यह मंदिर कुसौली गांव की पहाड़ी में निर्मित है. पिथौरागढ़ मुख्यालय से इस मंदिर की दूरी 6 किमी है. इस मंदिर की स्थापना 1972 में मदन मोहन शर्मा के प्रयासों से हुई थी. 1972 में मदन मोहन शर्मा ने जयपुर से छः सिरोंवाली मूर्ति लाकर यहां स्थापित की थी.कामाख्या मंदिर का मुख्य द्वार बंगला शैली में निर्मित है. इस मंदिर परिसर में बैठने के लिए कई छत्रियों का निर्माण किया गया है. मंदिर परिसर में बनी मुख्य छत्री का निर्माण कर्नल एस.एस.शेखावत ने करवाया है. इस मंदिर को सजाने संवारने में विशेष योगदान आर्किटेक्ट डी.एल.साह का रहा है. कामाख्या मंदिर परिसर में शुद्ध जल की व्यवस्था सौड़लेक पहाड़ी के ‘गंथर’ स्त्रोत से की गयी है. इस मंदिर से सामने की ओर पिथौरागढ़ हवाई के नैनी सैनी हवाई पट्टी की भव्य छवि दिखती है. कामाख्या मंदिर में कुछ व्यू पाइंट भी हैं. मंदिर से एक और तो सुंदर सीढ़ीदार हर भरे खेत दिखते हैं दूसरी ...